अगर सबने हिम्मत दिखाई ही होती ,
अगर उसकी कीमत लगाई न होती ।
अगर मान पहले सा मैके में मिलता ,
तो बेटी कभी भी पराई न होती ।
न भूलो कि दो घर हैं कंधों पे उसके ,
है ससुराल में तन तो मन मायके ।
करे सेवा सबकी नहीं कद्र उसकी ,
यूं ही जि़ंदगी का सफर तय वो करती ।
अगर प्यार बचपन का फिर से वो पाती ,
तो बेटी कभी भी पराई न होती ।
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