दरबार खड़ी माँ तेरे अब दूर करो अंधेरे ,
शेरावालिए माँ लेहड़ावालिए । दरबार.......
हारी हूँ माँ मैं हारी जीवन ये हो गया भारी ,
अब तो उपकार करो माँ मैं आई शरण तुम्हारी ।
इस बार नहीं मानूंगी तेरे द्वार से ना जाऊंगी ,
वैष्णोवालिए माँ पहाड़ावालिए । दरबार........
माँ ढूंढ़ लिया है तुमको अब दूर न जाना मुझसे ,
पूरी मुराद हो जाये है आस यही अब तुमसे ।
भंडार भरे हैं तेरे दु:ख दूर करो माँ मेरे ,
मैहरवालिए माँ पाटनवालिए । दरबार........
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