कल तक थी मैं
तनहा-तनहा
अब साथ है ये जहां ,
मुट्ठी में मेरे बस
रेत ही थे
अब सारा है आसमां |
कितने अरमां दिल में
लिए
चलती रही जिंदगी ,
थोड़ी बिखरी थोड़ी
उलझी
बढ़ती रही जिंदगी |
क्या था पता किस मोड़
पे
मंजिल मिलेगी कहाँ ,
मुट्ठी में मेरे बस
रेत ही थे
अब सारा है आसमां |
चलते-चलते आहें भरते
दिन वो गुजरते रहे ,
जब भी थकते फिर हम
उठते
हर दर्द सहते रहे |
कल तक थी मैं तनहा-तनहा
पर था यकीं इस
जिंदगी में
होगा कभी तो शमा ,
मुट्ठी में मेरे बस
रेत ही थे
अब सारा है आसमां |
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