Sunday, 20 December 2015

कल तक थी मैं तनहा-तनहा

कल तक थी मैं तनहा-तनहा

अब साथ है ये जहां ,

मुट्ठी में मेरे बस रेत ही थे

अब सारा है आसमां |


कितने अरमां दिल में लिए

चलती रही जिंदगी ,

थोड़ी बिखरी थोड़ी उलझी

बढ़ती रही जिंदगी |

क्या था पता किस मोड़ पे

मंजिल मिलेगी कहाँ ,

मुट्ठी में मेरे बस रेत ही थे

अब सारा है आसमां |

चलते-चलते आहें भरते

दिन वो गुजरते रहे ,

जब भी थकते फिर हम उठते

हर दर्द सहते रहे |

कल तक थी मैं तनहा-तनहा

पर था यकीं इस जिंदगी में

होगा कभी तो शमा ,

मुट्ठी में मेरे बस रेत ही थे


अब सारा है आसमां | 

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