स्तब्ध थी नि:शब्द
थी कि,
कुछ स्वर प्रस्फुटित
हुए |
ह्रदय झंकृत हुआ और
कुछ क्षण हम विचलित
हुए |
न जाने कौन सी वेदना
थी,
जो कबसे अंतर्मन में
दबी थी |
जीवन से संघर्ष कर
रही थी,
और मझधार में फँसी
थी |
पतवार बिना नौका
मेरी,
लहरों से लड़ रही थी
|
आशा है कभी न कभी
किनारों से जा
मिलेगी |
ठहरी हुई थी जो कभी
नदी अब अविरल बहेगी
|
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