Sunday, 27 December 2015

चेतना

मैं निष्कलुष होते हुए अपवाद बन चुप क्यों रहू ?

मंदाकिनी होते हुए कचरों में रहकर क्यों बहूँ |

अपराध क्या था मेरा ?

हर क्षण वेदना मिलती रही,


मन को मलिन करती रही

हर यातना सहती रही |

हाय ! रे निष्ठुर जगत मैंने बिगाड़ा क्या तुम्हारा ?

मेरे हर उपकार को अपकार समझा भ्रम तुम्हारा |

मैं मूढ़ बन बैठी रही और स्वयं ही छलती रही,

संसार को क्या दोष दूँ मैं स्वप्न में पलती रही,

मैं स्वयं से ही दूर थी और किंकर्तव्यविमूढ़ थी |

चेतन जगत में मैं अचेतन मन लिए मनमुग्ध थी,

जब चिरनिद्रा से जगी तो घोर अन्धकार था,


सूर्य अपनी रश्मियों के संग क्षितिज के पार था |

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