मैं निष्कलुष होते
हुए अपवाद बन चुप क्यों रहू ?
मंदाकिनी होते हुए
कचरों में रहकर क्यों बहूँ |
अपराध क्या था मेरा ?
हर क्षण वेदना मिलती
रही,
मन को मलिन करती रही
हर यातना सहती रही |
हाय ! रे निष्ठुर
जगत मैंने बिगाड़ा क्या तुम्हारा ?
मेरे हर उपकार को
अपकार समझा भ्रम तुम्हारा |
मैं मूढ़ बन बैठी रही
और स्वयं ही छलती रही,
संसार को क्या दोष
दूँ मैं स्वप्न में पलती रही,
मैं स्वयं से ही दूर
थी और किंकर्तव्यविमूढ़ थी |
चेतन जगत में मैं
अचेतन मन लिए मनमुग्ध थी,
जब चिरनिद्रा से जगी
तो घोर अन्धकार था,
सूर्य अपनी रश्मियों
के संग क्षितिज के पार था |
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