Tuesday, 2 June 2015

आशा

स्तब्ध थी नि:शब्द थी कि,

कुछ स्वर प्रस्फुटित हुए |

ह्रदय झंकृत हुआ और

कुछ क्षण हम विचलित हुए |


न जाने कौन सी वेदना थी,

जो कबसे अंतर्मन में दबी थी |

जीवन से संघर्ष कर रही थी,

और मझधार में फँसी थी |

पतवार बिना नौका मेरी,

लहरों से लड़ रही थी |

आशा है कभी न कभी

किनारों से जा मिलेगी |

ठहरी हुई थी जो कभी


नदी अब अविरल बहेगी |

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