कोई सत्य है या सत्य
की परछाई,
मैं नहीं जानती,
मैं पीछे भागती फिर
डरकर स्वयं में लौट आती |
जीवन जीते-जीते कब
मेरी सांस पे बन आई,
मैं नहीं जानती |
व्यथित ह्रदय से
स्वयं को संभालती कब कहाँ उलझ जाती,
मैं नहीं जानती |
मैं तो उस अदृश्य की
चाह भी नहीं कर सकती,
जो मिथ्या है सत्य
नहीं हो सकता,
इस स्वप्न का कोई
गंतव्य नहीं हो सकता |
मैं कब तक इस बाँध
को रोके रहूंगी,
मैं कब तक उस आकाश
कुसुम की आशा करुँगी,
मैं नहीं जानती |
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