Saturday, 23 May 2015

बदनसीब

गाँव की गीली मिटटी में पलकर बड़ी हुई,

नन्ही सी कली थी खिलकर बड़ी हुई |

तपती धूप में जलकर कड़ी हुई,

नहीं पता कि मुझसे किसको, गम व किसको ख़ुशी हुई |


पर इतना जानती हूँ कि, दरख्तों ने मुझे पाला है,

जिनसे लिपटकर खड़ी हुई |

एक छाँव जो मिली वो, भी न जाने कहाँ गुम हुई,

मैं धूप में चलती रही, प्यार के लिए तरसती रही |

ताउम्र मुझ ‘बदनसीब’ को,


स्वाती की बूँद भी न नसीब हुई |

No comments: