गाँव की गीली मिटटी
में पलकर बड़ी हुई,
नन्ही सी कली थी
खिलकर बड़ी हुई |
तपती धूप में जलकर
कड़ी हुई,
नहीं पता कि मुझसे
किसको, गम व किसको ख़ुशी हुई |
पर इतना जानती हूँ
कि, दरख्तों ने मुझे पाला है,
जिनसे लिपटकर खड़ी
हुई |
एक छाँव जो मिली वो,
भी न जाने कहाँ गुम हुई,
मैं धूप में चलती
रही, प्यार के लिए तरसती रही |
ताउम्र मुझ ‘बदनसीब’
को,
स्वाती की बूँद भी न
नसीब हुई |
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