Saturday, 23 May 2015

इक शहर हो अन्जाना सा

सोचा था इक शहर हो अन्जाना सा,

कुछ अपना कुछ बेगाना सा |

जहाँ तुम हो और मैं हूँ,

हों ढेरों ख्वाहिशों का आशियाना सा |


क्या कभी मुमकिन होगा अब ये,

जो अब तक है इक सपना सा |

ये ज़िंदगी की डोर थामे कब तक चलती रहूंगी,

कब तक चुपचाप सब सहती रहूँगी |

गर यही है ज़िंदगी तो ज़िंदगी न रहे,


ज़िंदगी गर रहे तो ये मुफ़लिसी न रहे |

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