सोचा था इक शहर हो
अन्जाना सा,
कुछ अपना कुछ बेगाना
सा |
जहाँ तुम हो और मैं
हूँ,
हों ढेरों ख्वाहिशों
का आशियाना सा |
क्या कभी मुमकिन
होगा अब ये,
जो अब तक है इक सपना
सा |
ये ज़िंदगी की डोर
थामे कब तक चलती रहूंगी,
कब तक चुपचाप सब
सहती रहूँगी |
गर यही है ज़िंदगी तो
ज़िंदगी न रहे,
ज़िंदगी गर रहे तो ये
मुफ़लिसी न रहे |
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