औरत की पीड़ा को अब
तक,
पुरुषों ने खूब
बढ़ाया है |
औरत के मन को हरदम,
पुरुषों ने दुःख
पहुँचाया है |
अपने मद में होकर
चूर,
औरत का मान गिराया
है |
अपने कदमों में
रखकर,
अपना वर्चस्व बनाया
है |
देख अकेली अबला
नारी,
उसका मन ललचाया है |
कभी हुई औरत से गलती,
तो उठ जाते उनके हाथ
|
अपनी गलती पर भी
कभी,
क्या कोई पुरुष
शरमाया है ?
नहीं करोगे यदि
अपमान,
करोगे औरत का सम्मान
|
तो, पाओगे तुम भी
सम्मान,
तब होगा जग का
उत्थान |
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