Friday, 20 March 2015

औरत की पीड़ा

औरत की पीड़ा को अब तक,

पुरुषों ने खूब बढ़ाया है |

औरत के मन को हरदम,

पुरुषों ने दुःख पहुँचाया है |

अपने मद में होकर चूर,

औरत का मान गिराया है |

अपने कदमों में रखकर,

अपना वर्चस्व बनाया है |

देख अकेली अबला नारी,

उसका मन ललचाया है |

कभी हुई औरत से गलती,

तो उठ जाते उनके हाथ |

अपनी गलती पर भी कभी,

क्या कोई पुरुष शरमाया है ?

नहीं करोगे यदि अपमान,

करोगे औरत का सम्मान |

तो, पाओगे तुम भी सम्मान,

तब होगा जग का उत्थान |

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