नारी ही क्यों रोती बार-बार,
क्या दोष उसी का है हर बार,
कभी अहिल्या को बना देते शिला,
कभी सीता होती राम से दूर,
धरा में समाने को मजबूर |
क्या पुरुष उसी को कहते हैं,
नारी का दमन जो करते हैं,
जो ठान ले तो कर जाए कुछ भी,
लड़ जाए नारी यम से भी |
सम्मान पति का होता कम,
तो नहीं कभी सहती नारी,
शिव बनकर के दिखलाओ तो,
बन सती चिता में जलती नारी |
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