Friday, 13 February 2015

नारी की अस्मिता

नारी ही क्यों रोती बार-बार,

क्या दोष उसी का है हर बार,

कभी अहिल्या को बना देते शिला,

कभी सीता होती राम से दूर,

धरा में समाने को मजबूर |

क्या पुरुष उसी को कहते हैं,

नारी का दमन जो करते हैं,

जो ठान ले तो कर जाए कुछ भी,

लड़ जाए नारी यम से भी |

सम्मान पति का होता कम,

तो नहीं कभी सहती नारी,

शिव बनकर के दिखलाओ तो,

बन सती चिता में जलती नारी |

No comments: