Monday, 26 January 2015

बचपन के दिन

कहाँ गए वो बचपन के दिन,
वो माँ की लोरी, वो माँ का आँचल |
वो बच्चों की टोली, वो हँसी ठिठोली,
वो सावन के झूले, और गरजते बादल |


कभी बगिया के पेड़ों पर चढ़ना-उतरना,
गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचना |
कभी फूलों पर बैठी तितलियाँ पकड़ना,
कभी बंदरों को मुँह चिढ़ाना |
कभी कच्चे आम-इमली, कभी पक्के खजूर,
कभी जामुन तो कभी खट्टे-मीठे अंगूर |
कहाँ गया वो सखियों के संग हर पल लगता गुंजन,
मिटटी की सोंधी खुशबू लगती थी जैसी चन्दन |  

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