कहाँ गए वो बचपन के
दिन,
वो माँ की लोरी, वो
माँ का आँचल |
वो बच्चों की टोली,
वो हँसी ठिठोली,
वो सावन के झूले, और
गरजते बादल |
कभी बगिया के पेड़ों
पर चढ़ना-उतरना,
गुड्डे-गुड़ियों का
ब्याह रचना |
कभी फूलों पर बैठी
तितलियाँ पकड़ना,
कभी बंदरों को मुँह
चिढ़ाना |
कभी कच्चे आम-इमली,
कभी पक्के खजूर,
कभी जामुन तो कभी
खट्टे-मीठे अंगूर |
कहाँ गया वो सखियों
के संग हर पल लगता गुंजन,
मिटटी की सोंधी
खुशबू लगती थी जैसी चन्दन |
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