साँझ भई चल घर
पंखेरू,
सारा दिन उड़ते-उड़ते,
दोनों को
ढूंढ़ते-ढूंढ़ते,
कहाँ से कहाँ तक,
धरती से आकाश तक,
थक गया तू चल घर
पंखेरू |
तेरी दुनिया में बस
दाना,
जिसके लिए तुझे हर
दिन जाना,
चलते-चलते दूर
क्षितिज का,
चक्कर लगाकर,
थक गया तू चल घर
पंखेरू |
हो गया धुंधला गगन,
है छा रहा कैसा
तिमिर |
विटप पर तेरा सदन,
ऋतु भी आई है शिशिर
|
लौट आ अब कर शयन,
तू चल घर पंखेरू |
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