Thursday, 22 January 2015

चल घर पंखेरू

साँझ भई चल घर पंखेरू,
सारा दिन उड़ते-उड़ते,
दोनों को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते,
कहाँ से कहाँ तक,
धरती से आकाश तक,
थक गया तू चल घर पंखेरू |

तेरी दुनिया में बस दाना,
जिसके लिए तुझे हर दिन जाना,
चलते-चलते दूर क्षितिज का,
चक्कर लगाकर,
थक गया तू चल घर पंखेरू |
हो गया धुंधला गगन,
है छा रहा कैसा तिमिर |
विटप पर तेरा सदन,
ऋतु भी आई है शिशिर |
लौट आ अब कर शयन,
तू चल घर पंखेरू |                 


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