जब यज्ञ ठाना दक्ष ने
पूछा नहीं शिव जी को ,
तब क्रुध्द होकर के सती ने
तज दिया प्राणों को । जब यज्ञ ..........
मानी नहीं बेटी थीं वो
मैके को अपने चल पड़ीं ,
थे साथ में शिव जी के गण
होनी थी अनहोनी बड़ी ।
पहुँचीं तो देखा यज्ञ में
स्थान शिव जी का नहीं ,
आए थे सारे देवता
आए थे सारे ऋषि मुनि ।
अपमान पति का सह ना पाईं
मन ही मन आहत हुईं ,
ना रोक पाईं एक पल
प्राणों की आहुति दे गई ।
शिव जी के गण क्रोधित हुए
सिर को अलग धड़़ से किया ,
मति मारी थी उस दक्ष की
जिसका मिला उसको सिला ।
कैसी है लीला जगत की
बेटी पराई मानते ,
होती है जैसे ही बड़ी
आँगन में दूजे फेंकते ।
ऐसा न होता जग मे तो
होती न उसकी दुर्गती ,
होती न कोई फिर सती ..
होती ....................।
होती....................।
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