याद आती है माँ की
जब-जब,
भीग जातीं पलकें तब-तब ।
विपदाओं से कुंठित माँ के
मन में छिपी वेदना को,
अंदर से कोमल पर,
ऊपर से निष्ठुर दिखती माँ को।
भीग जातीं पलकें तब-तब ।
विपदाओं से कुंठित माँ के
मन में छिपी वेदना को,
अंदर से कोमल पर,
ऊपर से निष्ठुर दिखती माँ को।
नहीं समझ पाई तब तक
थी दुनिया में
वो जब तक,
याद आती है माँ की जब-जब।
नहीं रोक पाती थी खुद को
रूठ जाती थी उससे जब तब,
नहीं पता था खो जाएगी
किस दुनिया में कब।
जब से रूठ गयी माँ मुझसे
नहीं मनाता कोई भी अब,
याद आती है माँ की जब-जब।
मेरे अच्छे जीवन के सपने
देखा करती थी वो कल तक,
सपना अब साकार हुआ
जब तीर लक्ष्य के पार हुआ,
तो नहीं हाथ माँ का सिर पर
याद आती है माँ की जब-जब।
याद आती है माँ की जब-जब।
नहीं रोक पाती थी खुद को
रूठ जाती थी उससे जब तब,
नहीं पता था खो जाएगी
किस दुनिया में कब।
जब से रूठ गयी माँ मुझसे
नहीं मनाता कोई भी अब,
याद आती है माँ की जब-जब।
मेरे अच्छे जीवन के सपने
देखा करती थी वो कल तक,
सपना अब साकार हुआ
जब तीर लक्ष्य के पार हुआ,
तो नहीं हाथ माँ का सिर पर
याद आती है माँ की जब-जब।
1 comment:
Very touching.
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